Bharat Mein Mahabharat

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Bharat Mein Mahabharat

Number of Pages : 638
Published In : 2016
Available In : Hardbound
ISBN : 978-93-263-5252-9
Author: Prabhakar Shrotriya

Overview

स्वर और व्यंजन के बीच निहित वाङ्मय में हो सकता है—इतनी विपुल ज्ञानराशि, भावराशि और विचार राशि को कौन ग्रहण करना न चाहेगा? पिछले पांच हजार वर्षों से नागर और लोक में वह प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और रिसकर आई विविध अर्थवत्ता और प्राण-चेतना से साहित्य और कलाओं को अनुप्राणित करता रहा है। महाभारत से गृहीत और प्रेरित सहस्रों रचनाओं का एक विशाल सागर है जो उसके नित नए अर्थ खोलता है। वैसे भी, कौन सौभाग्यशाली देश नहीं चाहेगा—ऐसी अक्षय-रसा ‘कामधेनु’ को दुहना, उससे पोषण पाना और जीवन के गहन अर्थों में अपने समय सोच और व्यंजना में उतरना और उतरते चले जाना...। महाभारत को कुछ लोग धर्म ग्रंथ कहते हैं, पर उसके लिए धर्म का अर्थ ‘मानवता’ है। भला बताइए संसार में ऐसा कौन-सा धर्म-ग्रंथ है जो अपने खिलाफ एक भी आवाज़ सुन पाता है? ऐसी गुस्ता$खी करने वाले कितने लोग सूली पर चढ़ाए गए, उन्हें ज़हर पिलाया गया और $कत्ल किया गया? पर हमारे पास क्या ऐसा एक भी उदाहरण है कि महाभारत के विरुद्ध रचने, कहने और बरतने के लिए किसी को दंडित किया गया? यह काव्य तो स्वयं अपने भीतर विरोधों, विसंगतियों, विद्रूपताओं का ऐसा संसार रचता है कि आप उससे ज़्यादा क्या रचेंगे? एक महाप्राण रचना ऐसी ही होती है जहाँ प्रेम और वीभत्सा एक साथ रह सकते है और हर एक को अपनी पात्रता और कामना के अनुरूप वह मिलता है जिससे वह अपने समय का सत्य अन्वेषित कर सके। संस्कृति ऐसे ही अनन्त स्रावों और टकरावों का नाम है, यह हमें महाभारत ने ही बताया है कि संस्कृति क्या होती है और कैसे रची जाती है? प्रतिष्ठित लेखक-मनीषी प्रभाकर श्रोत्रिय ने वर्षों की दूभर साधना से भारत में, और आसपास की दुनिया में, संस्कृत से लगाकर सभी भारतीय भाषाओं में महाभारत की वस्तु, सोच, प्रेरणा; यानि स्रोत से रची मुख्य रचनाओं पर इस ग्रंथ में एक सृजनात्मक ऊर्जा से पकी भाषा में विचार-विवेचन किया है, यह जानते हुए भी कि महाभारत की ‘दुनिया’ जो हज़ारों बांहों में भी  न समेटी जा सकी वह दो बांहों में कैसे समेटी जाएगी?... भारतीय ज्ञानपीठ अपने गौरवग्रंथों की परंपरा में पाठकों को यह ग्रंथ अॢपत करते हुए प्रसन्नता का अनुभव करता है। 

Price     Rs 700

स्वर और व्यंजन के बीच निहित वाङ्मय में हो सकता है—इतनी विपुल ज्ञानराशि, भावराशि और विचार राशि को कौन ग्रहण करना न चाहेगा? पिछले पांच हजार वर्षों से नागर और लोक में वह प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और रिसकर आई विविध अर्थवत्ता और प्राण-चेतना से साहित्य और कलाओं को अनुप्राणित करता रहा है। महाभारत से गृहीत और प्रेरित सहस्रों रचनाओं का एक विशाल सागर है जो उसके नित नए अर्थ खोलता है। वैसे भी, कौन सौभाग्यशाली देश नहीं चाहेगा—ऐसी अक्षय-रसा ‘कामधेनु’ को दुहना, उससे पोषण पाना और जीवन के गहन अर्थों में अपने समय सोच और व्यंजना में उतरना और उतरते चले जाना...। महाभारत को कुछ लोग धर्म ग्रंथ कहते हैं, पर उसके लिए धर्म का अर्थ ‘मानवता’ है। भला बताइए संसार में ऐसा कौन-सा धर्म-ग्रंथ है जो अपने खिलाफ एक भी आवाज़ सुन पाता है? ऐसी गुस्ता$खी करने वाले कितने लोग सूली पर चढ़ाए गए, उन्हें ज़हर पिलाया गया और $कत्ल किया गया? पर हमारे पास क्या ऐसा एक भी उदाहरण है कि महाभारत के विरुद्ध रचने, कहने और बरतने के लिए किसी को दंडित किया गया? यह काव्य तो स्वयं अपने भीतर विरोधों, विसंगतियों, विद्रूपताओं का ऐसा संसार रचता है कि आप उससे ज़्यादा क्या रचेंगे? एक महाप्राण रचना ऐसी ही होती है जहाँ प्रेम और वीभत्सा एक साथ रह सकते है और हर एक को अपनी पात्रता और कामना के अनुरूप वह मिलता है जिससे वह अपने समय का सत्य अन्वेषित कर सके। संस्कृति ऐसे ही अनन्त स्रावों और टकरावों का नाम है, यह हमें महाभारत ने ही बताया है कि संस्कृति क्या होती है और कैसे रची जाती है? प्रतिष्ठित लेखक-मनीषी प्रभाकर श्रोत्रिय ने वर्षों की दूभर साधना से भारत में, और आसपास की दुनिया में, संस्कृत से लगाकर सभी भारतीय भाषाओं में महाभारत की वस्तु, सोच, प्रेरणा; यानि स्रोत से रची मुख्य रचनाओं पर इस ग्रंथ में एक सृजनात्मक ऊर्जा से पकी भाषा में विचार-विवेचन किया है, यह जानते हुए भी कि महाभारत की ‘दुनिया’ जो हज़ारों बांहों में भी  न समेटी जा सकी वह दो बांहों में कैसे समेटी जाएगी?... भारतीय ज्ञानपीठ अपने गौरवग्रंथों की परंपरा में पाठकों को यह ग्रंथ अॢपत करते हुए प्रसन्नता का अनुभव करता है। 
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