Vajashrava Ke Bahane

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Vajashrava Ke Bahane

Number of Pages : 160
Published In : 2017
Available In : Hardbound
ISBN : 978-81-263-1982-4
Author: Kunwar Narain

Overview

हिन्दी के अग्रणी कवि कुंवर नारायण का यह दूसरा खंड-काव्य है। अपनी सुदीर्घ, सार्थक और यशस्वी रचना-यात्रा में उन्होंने अनेक बार हिन्दी कविता को प्रचलित पंक्तियों से उबार कर नये काव्यार्थ से समृद्ध किया है। आज से लगभग आधी सदी पहले प्रकाशित 'आत्मजयी’हिन्दी साहित्य में एक कीर्तिमान बन चुका है। 'वाजश्रवा के बहाने’अनेक समकालीन सन्दर्भों से जुड़ती हुई एक बिल्कुल नयी और स्वतंत्र रचना हैं, जिसकी आत्मजयी के परिप्रेक्ष्य में भी एक $खास जगह बनती है। इसमें आत्मिक और भौतिक के बीच द्वन्द्व न होकर दोनों के बीच समझौतों की कोशिशें हैं—इस तरह कि वे दोनों को समृद्ध करें न कि खारिज। समुद्र में फैले छोटे-बड़े द्वीपों की तरह इन कविताओं का एक सामूहिक अस्तित्व है, साथ ही हर कविता की अपनी अलग जमीन, तट और क्षितिज भी। एक लम्बे कालखंड में हानेवाले विभिन्न जीवनानुभवों और दृष्टियों की सूक्ष्म और मार्मिक अभिव्यक्ति का मन पर गहरा प्रभाव छूटता है। इस कृति मेंं पिता-पुत्र के सम्बंधों की स्मृतियाँ हैं जो क्रमश: प्रौढ़ होती हुई एक समावेशी जीवन-विवेक में स्थिरता खोजती है। समकालीन हिन्दी कविता में 'वाजश्रवा के बहाने’जैसे विरल काव्य का प्रकाशन निसंदेह एक आश्वस्तिपूर्ण घटना है।

Price     Rs 200

हिन्दी के अग्रणी कवि कुंवर नारायण का यह दूसरा खंड-काव्य है। अपनी सुदीर्घ, सार्थक और यशस्वी रचना-यात्रा में उन्होंने अनेक बार हिन्दी कविता को प्रचलित पंक्तियों से उबार कर नये काव्यार्थ से समृद्ध किया है। आज से लगभग आधी सदी पहले प्रकाशित 'आत्मजयी’हिन्दी साहित्य में एक कीर्तिमान बन चुका है। 'वाजश्रवा के बहाने’अनेक समकालीन सन्दर्भों से जुड़ती हुई एक बिल्कुल नयी और स्वतंत्र रचना हैं, जिसकी आत्मजयी के परिप्रेक्ष्य में भी एक $खास जगह बनती है। इसमें आत्मिक और भौतिक के बीच द्वन्द्व न होकर दोनों के बीच समझौतों की कोशिशें हैं—इस तरह कि वे दोनों को समृद्ध करें न कि खारिज। समुद्र में फैले छोटे-बड़े द्वीपों की तरह इन कविताओं का एक सामूहिक अस्तित्व है, साथ ही हर कविता की अपनी अलग जमीन, तट और क्षितिज भी। एक लम्बे कालखंड में हानेवाले विभिन्न जीवनानुभवों और दृष्टियों की सूक्ष्म और मार्मिक अभिव्यक्ति का मन पर गहरा प्रभाव छूटता है। इस कृति मेंं पिता-पुत्र के सम्बंधों की स्मृतियाँ हैं जो क्रमश: प्रौढ़ होती हुई एक समावेशी जीवन-विवेक में स्थिरता खोजती है। समकालीन हिन्दी कविता में 'वाजश्रवा के बहाने’जैसे विरल काव्य का प्रकाशन निसंदेह एक आश्वस्तिपूर्ण घटना है।
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