Khuda Ki Wapsi

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Khuda Ki Wapsi

Number of Pages : 172
Published In : 2018
Available In : Hardbound
ISBN : 8126306289
Author: Nasira Sharma

Overview

प्रतिष्ठिïत हिन्दी-कथाकार नासिरा शर्मा के इस नये कहानी-संग्रह 'खुदा की वापसी’ को दो अर्थों में लिया जा सकता है—एक तो यही कि यह सोच अब जा चुकी है कि पति एक दुनियावी खुदा है और उसके आगे नतमस्तक होना पत्नी का परम धर्म है; और दूसरी है उस खुदा की वापसी, जिसने सभी इनसानों को बराबर माना और औरत-मर्द को समान अधिकार दिये हैं। संग्रह की कहानियों में ऐसे सवालों के इशारे भी हैं कि—जो हमें उपलब्ध है उसे भूलकर हम उन मुद्ïदों के लिए क्यों लड़ते हैं जिन्हें धर्म, कानून, समाज, परिवार ने हमें नहीं दिया है? जो अधिकार हमें मिला है जब उसी को हम अपनी जिन्दगी में शामिल नहीं कर पाते और उसके बारे में लापरवाह रहते हैं, तब किस अधिकार और स्वतन्त्रता की अपेक्षा हम खुद से करते हैं? दरअसल 'खुदा की वापसी’ की सभी कहानियाँ उन बुनियादी अधिकारों की माँग करती नजर आती हैं जो वास्तव में महिलाओं को मिले हुए हैं, मगर पुरुष=समाज के धर्म-पण्डित मौलवी मौलिक अधिकारों को भी देने के विरुद्ध हैं। 'खुदा की वापसी’ की कहानियाँ एक समुदाय विशेष की होकर भी विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हैं। नारी के संघर्षों और उत्पीडऩों से उपजी विद्रूपताओं तथा अर्थहीन सामाजिक रूढ़ाचार पर तीखी चोट करती ये कहानियाँ समकालीन परिवेश और जीवन की विसंगतियों का प्रखर विश्लेषण भी करती हैं; भाषा और शिल्प के नयेपन सहित, पूरी समझदारी और ईमानदारी के साथ।

Price     Rs 150

प्रतिष्ठिïत हिन्दी-कथाकार नासिरा शर्मा के इस नये कहानी-संग्रह 'खुदा की वापसी’ को दो अर्थों में लिया जा सकता है—एक तो यही कि यह सोच अब जा चुकी है कि पति एक दुनियावी खुदा है और उसके आगे नतमस्तक होना पत्नी का परम धर्म है; और दूसरी है उस खुदा की वापसी, जिसने सभी इनसानों को बराबर माना और औरत-मर्द को समान अधिकार दिये हैं। संग्रह की कहानियों में ऐसे सवालों के इशारे भी हैं कि—जो हमें उपलब्ध है उसे भूलकर हम उन मुद्ïदों के लिए क्यों लड़ते हैं जिन्हें धर्म, कानून, समाज, परिवार ने हमें नहीं दिया है? जो अधिकार हमें मिला है जब उसी को हम अपनी जिन्दगी में शामिल नहीं कर पाते और उसके बारे में लापरवाह रहते हैं, तब किस अधिकार और स्वतन्त्रता की अपेक्षा हम खुद से करते हैं? दरअसल 'खुदा की वापसी’ की सभी कहानियाँ उन बुनियादी अधिकारों की माँग करती नजर आती हैं जो वास्तव में महिलाओं को मिले हुए हैं, मगर पुरुष=समाज के धर्म-पण्डित मौलवी मौलिक अधिकारों को भी देने के विरुद्ध हैं। 'खुदा की वापसी’ की कहानियाँ एक समुदाय विशेष की होकर भी विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हैं। नारी के संघर्षों और उत्पीडऩों से उपजी विद्रूपताओं तथा अर्थहीन सामाजिक रूढ़ाचार पर तीखी चोट करती ये कहानियाँ समकालीन परिवेश और जीवन की विसंगतियों का प्रखर विश्लेषण भी करती हैं; भाषा और शिल्प के नयेपन सहित, पूरी समझदारी और ईमानदारी के साथ।
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