Dhoop Mein Sidhi Sadak

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Dhoop Mein Sidhi Sadak

Number of Pages : 148
Published In : 2011
Available In : Hardbound
ISBN : 989326352116
Author: Santosh Dixit

Overview

"धूप में सीधी सड़क हिन्दी में बहुत कम लिखने की, ठहरकर, रणनीति बनाकर, शतरंज के खेल की तरह सोच-समझकर एक-एक चाल चलने की जो रिवायत है, उसके विपरीत सन्तोष दीक्षित लगातार लिखते रहे हैं। बकौल कथाकार, ''कहानीकार तो उनके पात्र हैं जो मेरे सर पर सवार होकर $$खुद को मुझसे लिखवा ले जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कोई मज़दूर मालिकों के दबाव पर रोज़मर्रे के अपने काम निबटाये चला जाता है। कभी धूप में पसीना बहाते हुए...।...कभी पुरवा के झोकों के साथ मस्ती भरे गीत गाते हुए...तो कभी फुर्सत के लम्हों में बीड़ी-तम्बाकू का लुत्$फ उठाते हुए...। मेरे लिए भी कहानी लिखना कुछ-कुछ ऐसा ही काम रहा है। कहीं से कोई अतिरिक्त प्रयास या पेशानी पर अतिरिक्त बल दिये बिना।’’ कुछ ऐसे ही जीते हुए, नौकरी, घर-गृहस्थी, आया-गया, भूल-चूक सबसे सहज भाव से निबटते, आगे बढ़ते हुए कथाकार ने जीवन में जो कुछ भी धरा-उठाया, उन्हीं कच्चे-पक्के अनुभवों का विस्तार हंै ये कहानियाँ। इस संग्रह में कथाकार के आस-पास के परिवेश से जुड़ाव और संघर्षोंे की दास्ताँ है। हँसने-बोलने, रोने-गाने, थकने-टूटने..सबकी आहट यहाँ मौजूद है। इसमें शराब से भरी रातों की सुबह है, तो प्रार्थना में जुड़े हाथों की शाम भी। इनमें एक मुकम्मल जीवन है। एक ऐसा जीवन...जो शायद तिल भर आपकी त्वचा से भी कहीं चिपका हो...। "

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"धूप में सीधी सड़क हिन्दी में बहुत कम लिखने की, ठहरकर, रणनीति बनाकर, शतरंज के खेल की तरह सोच-समझकर एक-एक चाल चलने की जो रिवायत है, उसके विपरीत सन्तोष दीक्षित लगातार लिखते रहे हैं। बकौल कथाकार, ''कहानीकार तो उनके पात्र हैं जो मेरे सर पर सवार होकर $$खुद को मुझसे लिखवा ले जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कोई मज़दूर मालिकों के दबाव पर रोज़मर्रे के अपने काम निबटाये चला जाता है। कभी धूप में पसीना बहाते हुए...।...कभी पुरवा के झोकों के साथ मस्ती भरे गीत गाते हुए...तो कभी फुर्सत के लम्हों में बीड़ी-तम्बाकू का लुत्$फ उठाते हुए...। मेरे लिए भी कहानी लिखना कुछ-कुछ ऐसा ही काम रहा है। कहीं से कोई अतिरिक्त प्रयास या पेशानी पर अतिरिक्त बल दिये बिना।’’ कुछ ऐसे ही जीते हुए, नौकरी, घर-गृहस्थी, आया-गया, भूल-चूक सबसे सहज भाव से निबटते, आगे बढ़ते हुए कथाकार ने जीवन में जो कुछ भी धरा-उठाया, उन्हीं कच्चे-पक्के अनुभवों का विस्तार हंै ये कहानियाँ। इस संग्रह में कथाकार के आस-पास के परिवेश से जुड़ाव और संघर्षोंे की दास्ताँ है। हँसने-बोलने, रोने-गाने, थकने-टूटने..सबकी आहट यहाँ मौजूद है। इसमें शराब से भरी रातों की सुबह है, तो प्रार्थना में जुड़े हाथों की शाम भी। इनमें एक मुकम्मल जीवन है। एक ऐसा जीवन...जो शायद तिल भर आपकी त्वचा से भी कहीं चिपका हो...। "
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