Magarmuhan

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Magarmuhan

Number of Pages : 328
Published In : 2016
Available In : Hardbound
ISBN : 978-93-263-5464-6
Author: Tarashankar Bandyopadhyaya

Overview

अपने पहले उपन्यास 'रानी कैकयी का सफरनामा’ में उन्होंने एक विराट फैंटेसी के माध्यम से भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष के विवेचन और भटकाव को रेखांकित करते हुए क्रान्ति के वास्तविक स्वरूप और सही दिशा का राजनैतिक विकल्प रचा था। अपने इस उपन्यास में उन्होंने व्यक्ति के रूपान्तरण के माध्यम से एक बेहतर मनुष्य और समाज की नयी संरचना का स्वप्न रचा है और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन की रूपरेखा भी प्रस्तुत की है। प्रभात की सम्पूर्ण रचनात्मकता में महात्मा गाँधी के सक्रिय आदर्श की अन्तर्धारा आद्यन्त विद्यमान रही है। इस उपन्यास में भी व्यक्ति के द्वारा समग्र सामाजिक रूपान्तरण का जो आदर्श प्रस्तुत किया गया है, वह भी गाँधी के पन्द्रहसूत्रीय कार्यक्रम का क्रियान्वित प्रतिरूप है। प्राचीन भारतीय सभ्यता, मान्यता, धार्मिक विश्वास, रीति-रिवाज और सामाजिक संरचना की जीवन्त मिसाल—पौराणिक और पुरा—ऐतिहासिक नगरी उज्जैन के प्राचीन मोहल्ले—मगरमुँहा से आरम्भ कर पूरे उज्जैन की परिक्रमा करता हुआ इसका कथा-चक्र परम्परा और आधुनिकता के बीच एक नैरन्तर्य के अन्त:सूत्र का अन्वेषण करता है और एक समग्र सामाजिक क्रान्ति के माध्यम से आधुनिक उज्जयिनी के सर्र्वांगीण काया-कल्प में पर्यवसित होता है। इसमें एक ओर है—आदर्श की पराकाष्ठा का मूर्तिमान चरित्र-शिखर तो दूसरी ओर है—उग्रपन्थ से मोहमुक्त चरम यथार्थवादी देवव्रत। आदर्श और यथार्थ की इस जुगलबन्दी से जो समाजसेवी अभियान शुरू हुआ है उसकी प्रतिश्रुति है—मेरा गाँव, मेरा नगर सबसे आगे उज्जैन प्रथम। इसका अगला कदम है—मध्यप्रदेश प्रथम और भारत प्रथम; अन्तत: विश्वमानव के समग्र कल्याण की विश्वदृष्टि।

Price     Rs 500

अपने पहले उपन्यास 'रानी कैकयी का सफरनामा’ में उन्होंने एक विराट फैंटेसी के माध्यम से भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष के विवेचन और भटकाव को रेखांकित करते हुए क्रान्ति के वास्तविक स्वरूप और सही दिशा का राजनैतिक विकल्प रचा था। अपने इस उपन्यास में उन्होंने व्यक्ति के रूपान्तरण के माध्यम से एक बेहतर मनुष्य और समाज की नयी संरचना का स्वप्न रचा है और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन की रूपरेखा भी प्रस्तुत की है। प्रभात की सम्पूर्ण रचनात्मकता में महात्मा गाँधी के सक्रिय आदर्श की अन्तर्धारा आद्यन्त विद्यमान रही है। इस उपन्यास में भी व्यक्ति के द्वारा समग्र सामाजिक रूपान्तरण का जो आदर्श प्रस्तुत किया गया है, वह भी गाँधी के पन्द्रहसूत्रीय कार्यक्रम का क्रियान्वित प्रतिरूप है। प्राचीन भारतीय सभ्यता, मान्यता, धार्मिक विश्वास, रीति-रिवाज और सामाजिक संरचना की जीवन्त मिसाल—पौराणिक और पुरा—ऐतिहासिक नगरी उज्जैन के प्राचीन मोहल्ले—मगरमुँहा से आरम्भ कर पूरे उज्जैन की परिक्रमा करता हुआ इसका कथा-चक्र परम्परा और आधुनिकता के बीच एक नैरन्तर्य के अन्त:सूत्र का अन्वेषण करता है और एक समग्र सामाजिक क्रान्ति के माध्यम से आधुनिक उज्जयिनी के सर्र्वांगीण काया-कल्प में पर्यवसित होता है। इसमें एक ओर है—आदर्श की पराकाष्ठा का मूर्तिमान चरित्र-शिखर तो दूसरी ओर है—उग्रपन्थ से मोहमुक्त चरम यथार्थवादी देवव्रत। आदर्श और यथार्थ की इस जुगलबन्दी से जो समाजसेवी अभियान शुरू हुआ है उसकी प्रतिश्रुति है—मेरा गाँव, मेरा नगर सबसे आगे उज्जैन प्रथम। इसका अगला कदम है—मध्यप्रदेश प्रथम और भारत प्रथम; अन्तत: विश्वमानव के समग्र कल्याण की विश्वदृष्टि।
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