Pallavi

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Pallavi

Number of Pages : 174
Published In : 2013
Available In : Hardbound
ISBN : 978-81-263-2012-7
Author: Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

Overview

‘पल्लवी’  डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का नया उपन्यास है। अपने पाठ में बहुवचनी इस उपन्यास में लेखक ने आद्योपान्त एक ऐसी मासूमियत का नज़ारा किया है, जिसका अभाव आज के तथाकथित बौद्धिक साहित्य में परिलक्षित होता है। यह विदित रहे कि तमाम प्रचलित (और बहुधा प्रशंसित) वजनी छद्ïमों से किनाराकशी करने मात्र से ही यह लेखकीय मासूमियत नहीं आती, ‘पल्लवी’ में हम उस साहस से भी बारहाँ दो-चार होते हैं जो सभासदों की कसीदाकारी के बीच अचानक शहंशाह की नंगई को उजागर कर देता है। लेखक इस उपन्यास में पन्ने-दर-पन्ने इस साहसिक मासूमियत को किसी औज़ार की तरह इस्तेमाल करता दिखता है। दरअसल आज के स्फीतिपरक; बड़बोले और चीख-चीखकर दर्ज किये गये मोटे-दबंग शब्दों से अँटे युग को ठीक-ठीक विवक्षित करने तथा निरन्तर छीजते जाते मानवीय मूल्यों को पुन: स्थापित करने का इससे कारगर उपाय कुछ हो भी नहीं सकता था। उपन्यास में ध्रुव और पल्लवी का प्लेटोनिक प्रेम, धु्रव का धीरोदात्त चरित्र,तत्पश्चात्ï उन उच्च चारित्रिक मूल्यों का पल्लवी में सन्निवेश बहुत ही रोचक व विश्वसनीय दिख पड़ता है। लेखक ने इन चरित्रों का कंट्रास्ट रचने के लिए कुछ और भी चरित्र— बिन्दु, वकील साहब, बिन्दु की भाभियाँ, पल्लवी के पिता इत्यादि भी सृजित किये हैं, नतीजतन श्याम के परिपाश्र्व में श्वेत की धवलता और भी निखरकर उद्ïभासित हुई है।

Price     Rs 200

‘पल्लवी’  डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का नया उपन्यास है। अपने पाठ में बहुवचनी इस उपन्यास में लेखक ने आद्योपान्त एक ऐसी मासूमियत का नज़ारा किया है, जिसका अभाव आज के तथाकथित बौद्धिक साहित्य में परिलक्षित होता है। यह विदित रहे कि तमाम प्रचलित (और बहुधा प्रशंसित) वजनी छद्ïमों से किनाराकशी करने मात्र से ही यह लेखकीय मासूमियत नहीं आती, ‘पल्लवी’ में हम उस साहस से भी बारहाँ दो-चार होते हैं जो सभासदों की कसीदाकारी के बीच अचानक शहंशाह की नंगई को उजागर कर देता है। लेखक इस उपन्यास में पन्ने-दर-पन्ने इस साहसिक मासूमियत को किसी औज़ार की तरह इस्तेमाल करता दिखता है। दरअसल आज के स्फीतिपरक; बड़बोले और चीख-चीखकर दर्ज किये गये मोटे-दबंग शब्दों से अँटे युग को ठीक-ठीक विवक्षित करने तथा निरन्तर छीजते जाते मानवीय मूल्यों को पुन: स्थापित करने का इससे कारगर उपाय कुछ हो भी नहीं सकता था। उपन्यास में ध्रुव और पल्लवी का प्लेटोनिक प्रेम, धु्रव का धीरोदात्त चरित्र,तत्पश्चात्ï उन उच्च चारित्रिक मूल्यों का पल्लवी में सन्निवेश बहुत ही रोचक व विश्वसनीय दिख पड़ता है। लेखक ने इन चरित्रों का कंट्रास्ट रचने के लिए कुछ और भी चरित्र— बिन्दु, वकील साहब, बिन्दु की भाभियाँ, पल्लवी के पिता इत्यादि भी सृजित किये हैं, नतीजतन श्याम के परिपाश्र्व में श्वेत की धवलता और भी निखरकर उद्ïभासित हुई है।
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