Phaans

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Phaans

Number of Pages : 276
Published In : 2012
Available In : Hardbound
ISBN : 978-93-263-5008-2
Author: Vijay Gaur

Overview

यदि एक शे’र का सहारा लें तो विजय गौड़ के पहले उपन्यास ‘फाँस’ के निहितार्थ को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं : ‘तुम जब कभी इस मुल्क का इतिहास लिखोगे।/ क्या उसमें मेरी भूख मेरी प्यास लिखोगे!!’ युवा लेखक विजय गौड़ विभाजन की त्रासदी के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया और उसके समानान्तर चलती ‘विकास’ की गतिविधियों को इस उपन्यास में परिभाषित करते हैं। स्वातन्त्र्योत्तर देश में किसके हिस्से कितनी आज़ादी आयी, किसके हिस्से की रौशनी लूट ली गयी, चन्द प्रतिशत लोगों ने किस प्रकार अपार जनसमुदाय के अधिकारों का संहार किया और हाशिए के लोग किन साजि़शों के तहत ठिकाने लगा दिए गये—ऐसे जाने कितने सवाल हैं जो कथावस्तु में गूँजते रहते हैं। यथार्थ को व्यक्त करने के लिए लेखक निम्नवर्गीय जन-जीवन को रचना के केन्द्र में रखता है। मंगू, गुरुप्रसाद, तुफैल, सोम्मी, रीना, पुरुषोत्तम जैसे श्रमजीवियों में बची हुई मनुष्यता को लेखक सघन आस्था के साथ रेखांकित करता है। अनपढ़ सोम्मी चुपचाप ‘स्त्री शक्ति’ का नया भाष्य रचती रहती है। ये चरित्र लम्बे समय तक याद रहते हैं। इनके बीच ‘डॉ. होगया’ जैसा अजीबोगरीब चरित्र भी है, जिसके कारण उपन्यास में रोचकता बढ़ती है। विजय गौड़ ने विचार और बाज़ार की रस्साकशी का जायज़ा भी लिया है। उनके पास विषयानुकूल व पात्रानुरूप भाषा व भंगिमा है। परिवेश जीवन्त हो उठता है और आशय स्पष्टï। ‘फाँस’ उस कसक या वेदना का बयान है जो एक जि़म्मेदार रचनाशील मन प्रतिपल अनुभव करता है, ‘विचारों का अन्त’ की पूँजीवादी, छद्म आधुनिक और अवसरवादी घोषणाओं के बावजूद। एक युवा दृष्टिïकोण के साथ रचा गया महत्त्वपूर्ण उपन्यास।

Price     Rs 270

यदि एक शे’र का सहारा लें तो विजय गौड़ के पहले उपन्यास ‘फाँस’ के निहितार्थ को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं : ‘तुम जब कभी इस मुल्क का इतिहास लिखोगे।/ क्या उसमें मेरी भूख मेरी प्यास लिखोगे!!’ युवा लेखक विजय गौड़ विभाजन की त्रासदी के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया और उसके समानान्तर चलती ‘विकास’ की गतिविधियों को इस उपन्यास में परिभाषित करते हैं। स्वातन्त्र्योत्तर देश में किसके हिस्से कितनी आज़ादी आयी, किसके हिस्से की रौशनी लूट ली गयी, चन्द प्रतिशत लोगों ने किस प्रकार अपार जनसमुदाय के अधिकारों का संहार किया और हाशिए के लोग किन साजि़शों के तहत ठिकाने लगा दिए गये—ऐसे जाने कितने सवाल हैं जो कथावस्तु में गूँजते रहते हैं। यथार्थ को व्यक्त करने के लिए लेखक निम्नवर्गीय जन-जीवन को रचना के केन्द्र में रखता है। मंगू, गुरुप्रसाद, तुफैल, सोम्मी, रीना, पुरुषोत्तम जैसे श्रमजीवियों में बची हुई मनुष्यता को लेखक सघन आस्था के साथ रेखांकित करता है। अनपढ़ सोम्मी चुपचाप ‘स्त्री शक्ति’ का नया भाष्य रचती रहती है। ये चरित्र लम्बे समय तक याद रहते हैं। इनके बीच ‘डॉ. होगया’ जैसा अजीबोगरीब चरित्र भी है, जिसके कारण उपन्यास में रोचकता बढ़ती है। विजय गौड़ ने विचार और बाज़ार की रस्साकशी का जायज़ा भी लिया है। उनके पास विषयानुकूल व पात्रानुरूप भाषा व भंगिमा है। परिवेश जीवन्त हो उठता है और आशय स्पष्टï। ‘फाँस’ उस कसक या वेदना का बयान है जो एक जि़म्मेदार रचनाशील मन प्रतिपल अनुभव करता है, ‘विचारों का अन्त’ की पूँजीवादी, छद्म आधुनिक और अवसरवादी घोषणाओं के बावजूद। एक युवा दृष्टिïकोण के साथ रचा गया महत्त्वपूर्ण उपन्यास।
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